बुजुर्गों का करें सम्मान “पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है। आजकल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है। हर चीज़ मुहैया है मेरे शहर में किस्तों पर, आजकल हसरतों पर लगाम कौन रखता है। बहलाकर छोड़ आते हैं वृद्धाश्रम में मां-बाप को, क्योंकि आजकल घर में पुराना सामान कौन रखता है ?” एक आश्रम का इंचार्ज आता है। साथ में बूढ़ी महिला है। वह कहता है-आइए माताजी आइए। एक वृद्ध चश्मा लगा कर अखबार पढ़ रहा है। खड़े होते हुए- अरे बहन जी नमस्ते। आइए आइए। इंचार्ज (आगे बढ़ते हुए)- क्या जमाना आ गया है, एक माता चार बच्चों को पाल सकती है, पर चार बच्चे मिलकर एक माँ को नहीं पाल सकते। इसीलिए तो ये वृद्धाश्रम की चौखट पर खड़े हैं। स्लोगन - ए जमाने यह कैसी तेरी रुसवाई है वृद्धाश्रम में फिर आज एक मां आई है क्या भूल गया तू वह तेरी परछाई है क्या भूल गया तेरी यह जिंदगी उसने ही बनाई है जो ना भूला, तो फिर आज किसकी मां वृद्धाश्रम आई है? कहकर चला जाता है। वृद्धा इधर-उधर देख रही है। वृद्ध - बहन जी, इत्मीनान से बैठिए। अब तो इसे अपना ही घर समझिए। वृद्धा (बिगड़ते हुए)- न, न, मेरा ...