अब दुख और नहीं गाँव के आख़िरी छोर पर एक छोटा-सा कच्चा घर था। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत और आँगन में खड़ा एक बूढ़ा नीम का पेड़। उस घर में रहती थी साठ वर्षीया सवित्री। गाँव वाले उसे "सवित्री अम्मा" कहकर बुलाते थे। कभी यही घर हँसी से गूँजता था। पति रामदास खेतों में काम करते थे और उनका इकलौता बेटा मोहन पूरे गाँव की जान था। लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि पहले बीमारी ने रामदास को छीन लिया और कुछ वर्षों बाद मोहन रोज़गार की तलाश में शहर चला गया। जाते समय उसने माँ के हाथ पकड़कर कहा था, "अम्मा, बस दो साल की बात है। पैसे कमाकर लौटूँगा। फिर आपको कभी काम नहीं करना पड़ेगा।" सवित्री ने मुस्कुराकर उसके माथे को चूम लिया था। लेकिन वे दो साल... पाँच साल बन गए... फिर दस साल। न कोई चिट्ठी, न कोई फ़ोन, न कोई ख़बर। गाँव वाले धीरे-धीरे कहने लगे, "अम्मा, अब वह नहीं आएगा।" लेकिन हर शाम सवित्री दरवाज़े पर बैठ जाती। दूर तक जाती पगडंडी को निहारती और मन ही मन कहती— "मेरा बेटा ज़रूर आएगा।" समय के साथ उसके बाल सफ़ेद हो गए। आँखों की रोशनी कम हो गई। फिर भी उसने बेटे के लिए एक था...
जिस प्रकार समस्त गुण 'विनम्रता' में आश्रय पाते हैं, उसी प्रकार सारे गुण 'अहंकार' का आश्रय पाते ही नष्ट भी हो जाते हैं। जिस प्रकार समस्त गुण 'विनम्रता' में आश्रय पाते हैं, उसी प्रकार सारे अवगुण 'अहंकार' के आश्रय में फलते-फूलते हैं। परम ज्ञानी रावण इसका जीता-जागता उदाहरण है। अतः विनम्र बनें, अहंकारी नहीं। पेड़-पौधे, नदियाँ-झरने पाते यदि बोल, सबसे पहले मानव की ही खोलते वो पोल। सबसे पहले मानव की खोल देते पोल। एक ओर तो पूजता पूजा करके हमारी फिर बर्बाद धरती को कर रहा समझ न पाया कया मोल