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बुजुर्गों का करें सम्मान (लघु नाटक) Hindi Play on old home

बुजुर्गों का करें सम्मान “पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है। आजकल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है।  हर चीज़ मुहैया है मेरे शहर में किस्तों पर,  आजकल हसरतों पर लगाम कौन रखता है। बहलाकर छोड़ आते हैं वृद्धाश्रम में मां-बाप को, क्योंकि आजकल घर में पुराना सामान कौन रखता है ?” एक आश्रम का इंचार्ज आता है। साथ में बूढ़ी महिला है।   वह कहता है-आइए माताजी आइए। एक वृद्ध चश्मा लगा कर अखबार पढ़ रहा है। खड़े होते हुए- अरे बहन जी नमस्ते। आइए आइए। इंचार्ज (आगे बढ़ते हुए)- क्या जमाना आ गया है, एक माता चार बच्चों को पाल सकती है, पर चार बच्चे मिलकर एक माँ को नहीं पाल सकते। इसीलिए तो ये वृद्धाश्रम की चौखट पर खड़े हैं। स्लोगन -  ए जमाने यह कैसी तेरी रुसवाई है  वृद्धाश्रम में फिर आज एक मां आई है  क्या भूल गया तू वह तेरी परछाई है क्या भूल गया तेरी यह जिंदगी उसने ही बनाई है  जो ना भूला, तो फिर आज किसकी मां वृद्धाश्रम आई है? कहकर चला जाता है।  वृद्धा इधर-उधर देख रही है। वृद्ध - बहन जी, इत्मीनान से बैठिए। अब तो इसे अपना ही घर समझिए। वृद्धा (बिगड़ते हुए)- न, न, मेरा ...
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हिंदी : कल आज और कल (Hindi Kavita on Hindi diwas)

 

Hindi poem on nature प्रकृति एवं पर्यावरण पर हिंदी कविता

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“मत काटो इन पेड़ों को” Hindi Kavita on nature

  “मत काटो इन पेड़ों को” मत काटो इन पेड़ों को, ये साँसों का अनुपम संसार हैं। इनकी ठंडी छाँव तले, बसते जीवन के सब त्योहार हैं। नदियाँ सिर्फ पानी नहीं, धरती मां के नयनों का नीर हैं। इनकी हर लहर में छिपी, हम सब मानव की तक़दीर है। सोचो, पक्षी जब घर खो देंगे, तो वे गीत कहाँ फिर गाएँगे? सूनी-सूनी उजड़ी डालों पर, फिर कैसे वे चहचहाएंगे? पहाड़ अगर मौन हुए तो, फिर बादल किससे टकराएँगे? सूख गई प्यारी धरती माँ, तो कैसे हम जी पाएँगे? कब जानेंगे प्रकृति की कीमत? जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, जब हर नदी सूख जाएगी, अंतिम चिड़िया भी उड़ जाएगी… अरे, तब तक तो बहुत देर हो जायेगी, हर सांस तब थम जाएगी। वैज्ञानिक खोज धरी रह जाएगी, तकनीक पड़ी रह जाएगी। इसलिए  आज भी वक़्त है साथियो, आओ मिलकर ये प्रण करें। लगाएं हम हर घर में पौधा, हर आँगन में हरियाली भरें। अगली पीढ़ी को धन नहीं, सांसों का अनुपम उपहार दें‌‌। वो हम पर गर्व करें, इतराएँ, उनको हरा-भरा संसार दें।    आओ मिल प्रकृति को बचाएँ, यही मानवता की पहचान है। धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी शान है। धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी...

अब दुख और नहीं (Hindi story)

अब दुख और नहीं गाँव के आख़िरी छोर पर एक छोटा-सा कच्चा घर था। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत और आँगन में खड़ा एक बूढ़ा नीम का पेड़। उस घर में रहती थी साठ वर्षीया सवित्री। गाँव वाले उसे "सवित्री अम्मा" कहकर बुलाते थे। कभी यही घर हँसी से गूँजता था। पति रामदास खेतों में काम करते थे और उनका इकलौता बेटा मोहन पूरे गाँव की जान था। लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि पहले बीमारी ने रामदास को छीन लिया और कुछ वर्षों बाद मोहन रोज़गार की तलाश में शहर चला गया। जाते समय उसने माँ के हाथ पकड़कर कहा था, "अम्मा, बस दो साल की बात है। पैसे कमाकर लौटूँगा। फिर आपको कभी काम नहीं करना पड़ेगा।" सवित्री ने मुस्कुराकर उसके माथे को चूम लिया था। लेकिन वे दो साल... पाँच साल बन गए... फिर दस साल। न कोई चिट्ठी, न कोई फ़ोन, न कोई ख़बर। गाँव वाले धीरे-धीरे कहने लगे, "अम्मा, अब वह नहीं आएगा।" लेकिन हर शाम सवित्री दरवाज़े पर बैठ जाती। दूर तक जाती पगडंडी को निहारती और मन ही मन कहती— "मेरा बेटा ज़रूर आएगा।" समय के साथ उसके बाल सफ़ेद हो गए। आँखों की रोशनी कम हो गई। फिर भी उसने बेटे के लिए एक था...

विनम्रता

  जिस प्रकार समस्त गुण 'विनम्रता' में आश्रय पाते हैं, उसी प्रकार सारे गुण 'अहंकार' का आश्रय पाते ही नष्ट भी हो जाते हैं।  जिस प्रकार समस्त गुण 'विनम्रता' में आश्रय पाते हैं, उसी प्रकार सारे अवगुण 'अहंकार' के आश्रय में फलते-फूलते हैं। परम ज्ञानी रावण इसका जीता-जागता उदाहरण है। अतः विनम्र बनें, अहंकारी नहीं। पेड़-पौधे, नदियाँ-झरने पाते यदि बोल,  सबसे पहले मानव की ही खोलते वो पोल। सबसे पहले मानव की खोल देते पोल। एक ओर तो पूजता पूजा करके हमारी  फिर बर्बाद धरती को कर रहा  समझ न पाया कया मोल

HINDI THOUGHT (HINDI QUOTATION)

  उस पथ का पथिक होना भी क्या  जिस पर बिखरे शूल न हों। उस नाव का खेना भी क्या खेना  जिसकी धारा प्रतिकूल न हो।। दिल में अरमान रखता हूँ चाहे जाऊँ जहाँ भी  ये हिंदुस्तान दिल में रखता हूँ  वो कौन हैं जो डटे हैं मुझे हराने के लिए  किसमें दम है मुझे हटाने के लिए  आज भी करोड़ों खड़े हैं सिर कटाने के लिए। । फूल बनकर ही खिलना चमन के लिए,  कोशिशें खूब करना अमन के लिए, यूँ तुम्हारा, न हो बाल बाँका कभी, पर, हो ज़रूरी तो मिटना वतन के लिए।। जीवन पथ है संघर्ष पथ, निरंतर आगे बढ़ते जाना है।  इस उपलब्धि को मंजिल समझ, नहीं यहीं रुक जाना है। ज़िंदगी में आने की खबर तो 9 महीने पहले मिल जाती है लेकिन जाने की खबर 9 सेकंड पहले भी नहीं मिल पाती इसलिए मस्त रहो व्यस्त रहो। एक स्कूल खोलने का अर्थ है, एक कारागार बंद करना। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र निर्माण हो और मन की शक्ति में वृद्धि हो। चरित्र निर्माण में अक्षम शिक्षा अर्थहीन है । पत्थर के लिए जो भूमिका मूर्तिकला की है, वही भूमिका मनुष्य के लिए शिक्षा की है। यदि निर्धन शिक्षा तक नहीं पहुंच सकता, तो शिक्षा को निर्...