(क) परोपकार
परोपकार शब्द ‘पर’ तथा ‘उपकार’ इन दो शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ है - किसी अन्य की मदद करना या उसकी सेवा करना करना। परोपकार की भावना न केवल व्यक्ति की आत्मा का विकास करती है, बल्कि समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। परोपकार के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के ऐसे कार्य आ सकते हैं, जो दूसरों की भलाई के लिए किए गए हों। जैसे - विश्व सेवा, समाज सेवा, आपदा में मदद, गरीबों और बेसहारा लोगों की सहायता, जनहित में काम करना और पर्यावरण की सुरक्षा आदि। परोपकार एक सामाजिक गुण है। परोपकारी व्यक्ति स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ के बजाय समाज के हित में सोचता है और सक्रिय रूप से सेवा करता है। परोपकार का जीवन में बहुत महत्व होता है, इससे हमें समाज में सुधार करने की ताकत मिलती है और हम दूसरों की मदद करके अपनी भावनाओं को ऊँचा करते हैं। इसके अलावा, परोपकार का महत्वपूर्ण पहलु प्रकृति संरक्षण में होता है। इससे हम अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं और उसे स्वस्थ बनाने के लिए अपनी सहायता प्रदान करते हैं। इस प्रकार, हमें परोपकार के महत्व को समझना चाहिए और इसे अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका देनी चाहिए।
(ख) भारतीय संस्कृति
भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है जो लगभग 5,000 हजार वर्ष पुरानी है। विश्व की पहली और महान संस्कृति के रुप में भारतीय संस्कृति को माना जाता है। पूरे विश्व में भारत अपनी संस्कृति और परंपरा के लिये प्रसिद्ध देश है। यह विभिन्न संस्कृति और परंपरा की भूमि है। भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण तत्व अच्छे शिष्टाचार, तहज़ीब, सभ्य संवाद, धार्मिक संस्कार, मान्यताएँ और मूल्य आदि हैं। अब जबकि हरेक की जीवन शैली आधुनिक हो रही है, भारतीय लोग आज भी अपनी परंपरा और मूल्यों को बनाए हुए हैं। भारत संस्कृतियों से समृद्ध देश है, जहाँ अलग-अलग संस्कृतियों के लोग रहते हैं। हम भारतीय संस्कृति का बहुत सम्मान और आदर करते हैं। संस्कृति सब कुछ है, जैसे - दूसरों के साथ व्यवहार करने का तरीका, विचार, प्रथा जिसका हम अनुसरण करते हैं। कला, हस्तशिल्प, धर्म, खाने की आदत, त्योहार, मेले, संगीत और नृत्य आदि सभी संस्कृति का हिस्सा है। भारतीय संस्कृति विभिन्नता में एकता का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। भारत अधिक जनसंख्या के साथ एक बड़ा देश है जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग अपनी अनोखी संस्कृति के साथ एकसाथ रहते हैं। देश के कुछ मुख्य धर्म हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन और यहूदी हैं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न – भिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं। आमतौर पर यहाँ के लोग वेशभूषा, सामाजिक मान्यताओं, प्रथा और खाने की आदतों में भिन्न होते हैं। यहां सभी लोग विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों सहित कुछ राष्ट्रीय उत्सवों को एकसाथ मनाते हैं, जैसे- गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गाँधी जयंती आदि। बिना एक-दूसरे में टाँग अड़ाये बेहद खुशी और उत्साह के साथ देश के विभिन्न भागों में विभिन्न धर्मों के लोग अपने त्योहारों को मनाते हैं। भारत पुरुष और स्त्री, जाति और धर्म आदि का देश नहीं है बल्कि ये एकता का देश है जहाँ सभी जाति और संप्रदाय के लोग एक साथ रहते हैं। भारत में लोग आधुनिक हैं और समय के साथ बदलती आधुनिकता का अनुसरण करते हैं फिर भी वो अपनी सांस्कृतिक मूल्यों और परंपरा से जुड़े हुए हैं।
(ग) अनुशासन
अनुशासन एक क्रिया है जो अपने शरीर, दिमाग और आत्मा को नियंत्रित करता है और परिवार के बड़ों, शिक्षकों और माता-पिता की आज्ञा को मानने के द्वारा सभी कार्य को सही तरीके से करने में मदद करता है। हमें हमेशा अनुशासन में होना चाहिये और अपने जीवन में सफल होने के लिये अपने शिक्षक और माता-पिता के आदेशों का पालन करना चाहिये। हमें सुबह जल्दी उठना चाहिये, निययमित दिनचर्या के तहत साफ पानी पीकर शौचालय जाना चाहिये, दाँतों को साफ करने के बाद नहाना चाहिये और इसके बाद नाश्ता करना चाहिये। बिना खाना लिये हमें स्कूल नहीं जाना चाहिये। हमें सही समय पर स्वच्छता और सफाई से अपना गृह-कार्य करना चाहिये। हमें कभी भी अपने माता-पिता की बातों का निरादर, नकारना या उन्हें दुखी नहीं करना चाहिये। हमें अपने स्कूल में पूरे यूनिफार्म में और सही समय पर जाना चाहिये। कक्षा में स्कूल के नियमों के अनुसार हमें प्रार्थना करना चाहिये। हमें अपने शिक्षकों की आज्ञा का पालन करना चाहिये, साफ लिखावट से अपना कार्य करना चाहिये तथा सही समय पर दिये गये पाठ को अच्छे से याद करना चाहिये। हमें शिक्षक, प्रधानाध्यापक, चौकीदार, खाना बनाने वाले या विद्यार्थियों से बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिये। हमें सभी के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिये, चाहे वो घर, स्कूल, कार्यालय या कोई दूसरी जगह हो। बिना अनुशासन के कोई भी अपने जीवन में कोई भी बड़ी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये अपने जीवन में सफल इंसान बनने के लिये हमें अपने शिक्षक और माता-पिता की बात माननी चाहिये।
(घ) परिश्रम का महत्त्व
मेहनत का कोई विकल्प और शॉर्टकट नहीं है। जब सफलता प्राप्त करने की बात आती है, तो कठिन परिश्रम करने के अलावा दिमाग में और कोई विचार नहीं आता है। कड़ी मेहनत न केवल सफल होने का एक महत्वपूर्ण साधन है, बल्कि यह बेहतर जीवन के लिए महत्वपूर्ण भी है। हम अपने जीवन के विभिन्न चरणों में चुनौतियों का सामना करते हैं। छात्र सेमेस्टर में सभी परीक्षाओं को पास किए बिना अपनी डिग्री नहीं पा सकते हैं या जो कर्मचारी किसी कंपनी में काम कर रहा है, उसे बिना मेहनत के प्रमोशन नहीं मिलेगा। सभी सफल खेल हस्तियों, कलाकारों और लेखकों ने प्रसिद्धि या वांछित फल प्राप्त किया है क्योंकि उन्होंने इसके बारे में सपना देखने के अलावा पहले दिन से ही कड़ी मेहनत करना शुरू कर दिया था। यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में जो कुछ भी करता है उसमें सफल होना चाहता है उसको अपने जीवन में आत्म-अनुशासन, समर्पण, प्रतिबद्धता और निरंतरता जैसे गुणों की जरूरत है। कड़ी मेहनत ही एकमात्र तरीका है जिससे आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं।
(ङ) मेरा प्रिय मित्र
(च) देश प्रेम
देश प्रेम का अर्थ है - अपने देश भारत के प्रति मन में प्यार, सम्मान तथा त्याग - समर्पण की भावना होना। अतीत में, विशेष रूप से ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, कई लोग अपने देशवासियों के अंदर देशभक्ति की भावना पैदा करने के लिए आगे आए। देशभक्तों ने बैठकों का आयोजन किया तथा उनके आसपास के लोगों को प्रेरित करने के लिए भाषण देते हुए कई उदाहरणों का उपयोग किया। उसी प्रकार, जब बच्चे छोटे हों, तभी से उनके अन्दर देशभक्ति की भावना पैदा की जानी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में भी बच्चों के अन्दर अपने देश के प्रति प्यार और सम्मान की भावना को स्थापित करना चाहिए। कई संस्थान 15 अगस्त और 26 जनवरी को समारोह एवं कार्यक्रम आयोजित करते हैं, उनमें देशभक्ति गीत गाए जाते हैं और उस दौरान देशभक्ति की भावना आसपास के पूरे देश को घेरी रहती है। लेकिन ऐसा वातावरण सामान्य रूप से सदैव होना चाहिए ना कि केवल इन विशेष तिथियों के आसपास ही। तभी जाके ये भावनाएं हमेशा के लिए हर नागरिक के दिल में बैठ जाएंगी।
(छ) पुस्तक मेला
मैं बहुत दिनों से अपने दादाजी के लिए भगवतगीता एवं चारों वेद तथा स्वयं के लिए रामायण और महाभारत की पुस्तकें खरीदना चाहता था। अतः मुझे एक ऐसे स्थान या दुकान की तलाश थी, जहां मेरी पसंद की सभी पुस्तकें मुझे मिल जाएं। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब मुझे पता चला कि मेरे शहर लखनऊ में ही एक बहुत बड़ा पुस्तक मेला लग रहा है। मैं और मेरे पिताजी नियत समय पर उस मेले में पहुंच गए। वहां चारों ओर किताबों की दुकानें थीं। हम कुछ ही कदम आगे बढ़े थे कि मेरी नजर कृष्ण - अर्जुन के चित्र वाली एक पुस्तक पर पड़ी, वह भागवत गीता ही थी। कदम उस ओर अनायास ही बढ़ गये मानो मंजिल यही हैं। मैंने विक्रेता से अपनी पसंद की किताबों का पूछा तो उन्होंने मेरे द्वारा माँगी गई सभी पुस्तकें लाकर रख दीं। कुछ मिनट तक मैं और पिताजी बारी - बारी से सभी पुस्तकों को देखते रहे और अंत में भुगतान कर ये पुस्तकें हमने खरीद लीं। उस पुस्तक मेले में डेढ़-दो घंटे तो पता ही नहीं चला, कब बीत गए। सूर्य देव धीरे-धीरे पश्चिम की ओर चले पड़े हमें भी घर चलना था। हम निकले और बस पकड़कर अगले एक घंटे में अपने घर आ चुके थे। जब मैंने घर जाकर दादाजी को वे पुस्तकें दीं तो वे बहुत प्रसन्न हुए और मुझे प्यार से गले लगा लिया । जिस तरह आज घर-घर इन्टरनेट ने अपनी दस्तक दी है, पुस्तकों का महत्व निरंतर कम होता जा रहा है। लोग अपने फोन में ही अब किताबें पढ़ने लगे हैं। मगर इससे आँखों का बड़ा नुकसान भी होता है, दूसरी तरफ पुस्तकें छपनी भी कम हो रही हैं। ऐसे में हमें चाहिए कि हम पुस्तकों की ओर वापस लौटें। आप भी जब कभी पुस्तक मेले में जाने का अवसर हाथ लगे, अवश्य जाएँ, क्योंकि पुस्तकें ही हमारी सच्ची मार्गदर्शक होती है। इस तरह के आयोजन कही लुप्त न हो जाएँ इसलिए पुस्तक मेले जाएँ भी और अपनी पसंद की कोई पुस्तक भी खरीद कर अवश्य लाएँ।
(ज) व्यायाम के लाभ
व्यायाम का अर्थ होता है अपने शरीर की देख-रेख। रोजाना नियम से अपने शरीर को अपनी सीमा से आगे धकेलना। स्वास्थ्य के लिए व्यायाम अत्यंत आवश्यक हैं। व्यायाम करने से मनुष्य का स्वास्थ्य और उसका दिमाग दोनों ही स्वस्थ रहते हैं। व्यायाम प्रत्येक बीमारी को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय हैं। व्यायाम करने से हमें बहुत सारे फायदे होते हैं। व्यायाम हमें तंदुरुस्त और स्वस्थ रखने के लिए सबसे ज्यादा सहायता करता है। व्यायाम का महत्व हमें व्यायाम करके ही मालूम चलता है। व्यायाम करने के लिए सही स्थान और समय का बहुत महत्व है। व्यायाम करने के लिए अत्यधिक रोशनी और स्वच्छ हवा आवश्यक है। इसलिए खुले इलाके व्यायाम करने के लिए सबसे अच्छी जगह हैं। इस स्थान में खुली हवा का बहाव होता है। खुली जगह में व्यायाम करने से इसका महत्व बढ़ जाता है। सुबह और शाम व्यायाम के लिए सबसे लाभकारी समय है। खासतौर पर सुबह का समय सबसे अनुकूल माना गया है। देर रात और दोपहर में व्यायाम करने से कोई भी फायदा नहीं होता है। हम अलग – अलग प्रकार के व्यायाम कर सकते हैं। जैसे कि सुबह-सुबह उठकर टहलना, साइकिल चलाना और योग करना इत्यादि। रस्सी कूद, उठक – बैठक, लम्बी कूद, गोला-फेंक ये सभी भी व्यायाम के प्रकार हैं। कुश्ती, खेल, साइकिल चलाना, और विभिन्न खेलों में भाग लेना जैसे फुटबॉल, क्रिकेट, हॉकी, टेनिस, बैडमिंटन, कबड्डी, आदि भी व्यायाम हैं। यहां तक कि तैराकी, दौड़ना या लंबी दूरी तक चलना भी व्यायाम का हिस्सा हैं। नियमित व्यायाम करने से मांसपेशियां तो स्वस्थ रहती ही हैं, साथ ही शरीर में खून का बहाव भी बेहतर ढंग से होता है। यह मोटापे को कम करने में मदद करता है और ऊर्जा के स्तर को बढ़ाता है। व्यायाम करने से तनाव कम होता है और मानसिक स्थिति में सुधार होता है। यह अच्छी नींद को प्राप्त करने में मदद करता है और आत्म-संतोष बढ़ाता है। अतः हमें अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के योग और शारीरिक व्यायाम अवश्य करने चाहिए।
(झ) मेरा विद्यालय
हमारा विद्यालय एक मंदिर के समान है, जहाँ हम रोज पढ़ने आते हैं, ताकि अपने जीवन में उज्ज्वल भविष्य प्राप्त कर सकें। हमारे विद्यालय में सभी को एक समान दर्जा दिया जाता है। हमें प्रतिदिन विद्यालय जाना बहुत ही अच्छा लगता है क्योंकि विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ पर हमें प्रतिदिन कुछ-न-कुछ नया सीखने को मिलता है।
मेरे विद्यालय का नाम स्वामी विवेकानंद पब्लिक विद्यालय है। इसमें पहली से दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है। यह सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेण्डरी एजूकेशन, महाराष्ट्र से सम्बद्ध है। मेरे विद्यालय का भवन विशाल और बहुत ही सुंदर है।
विद्यालय का वातावरण बहुत ही शांत है । कोई विद्यार्थी व्यर्थ में ना घूमता मिलेगा न ही कहीं बैठा हुआ मिलेगा। कोई बाहरी आदमी अध्ययन के समय कक्षाओं के सामने से नहीं गुजर पाएगा। कोई कक्षा बिना अध्यापक के नहीं होगी। वातावरण की यह विशेषता ही छात्रों को अध्ययन करने की प्रेरणा देती है। विद्यालय आरम्भ होने से पहले प्रत्येक कमरा साफ होता है। शीशे, दरवाजे, तथा बेंच साफ होते हैं। कागज या रोटी का टुकड़ा, फलों या सब्जी के छिलके फर्श तथा गैलरी में नहीं मिलेंगे। कूड़ा-करकट डालने के लिए स्थान-स्थान पर 'डस्ट-बिन' रखे गए हैं। पेशाब-घर तथा शौचालय दुर्गन्ध रहते हैं।
शिक्षण एक कला है और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। शिक्षक प्रतिदिन छात्रों को गृह-कार्य देते हैं तथा अगले दिन उसे देखते हैं। कमजोर छात्र-छात्राओं को विद्यालय अवकाश के बाद आधा घंटा ज्यादा समय दिया जाता है। यही कारण है कि हमारे विद्यालय का परीक्षा-परिणाम न केवल शत-प्रतिशत रहता है बल्कि दसवीं में कई छात्र राज्य में अव्वल भी आते है। विद्यालय में हमें नृत्य, कला, संगीत, खेल - कूद सभी प्रकार की गतिविधियाँ कराई जाती हैं। इसीलिए मुझे मेरा विद्यालय बहुत प्रिय है।
(ञ) सत्संगति
सत्संगति का अर्थ है - अच्छी संगति या साथ। जैसे एक गला हुआ फल सभी को गला देता है जबकि एक पका फल सभी फ़लों को पका देता है। कुछ इसी प्रकार का प्रभाव संगति का मानव पर भी होता है। सत्संगति का अर्थ अच्छे लोगों की संगति तो है ही परंतु शांत व शुद्ध वातावरण एवं अच्छे विचारों का भी हम पर बहुत असर पड़ता है। मन सदा लक्ष्य की ओर केंद्रित रहता है व इधर- उधर नहीं भटकता। जैसे एक बच्चा अपने माता-पिता के व्यक्तित्व का प्रतिबिंब होता है, उसी प्रकार संगति का असर हमारे व्यवहार पर भी होता है। जहाँ सत्संगति हमें सफलता की राह पर ले जाती है, वही कुसंगति असफलता के गर्त में गिरा देती है। गलत काम करना धीरे-धीरे हमारी आदत में शुमार हो जाता है और पूरा व्यक्तित्व विषैला हो जाता है। अतः व्यक्ति को अपनी संगति का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए | कबीर भी अपने एक दोहे में बताते हैं कि किस प्रकार एक ही पानी की बूँद मोती का रूप भी धारण कर सकती है और विष का भी, फर्क है तो सिर्फ इस बात का कि वह बूँद किसके संपर्क में आती है। हमें भी ध्यान रखना चाहिए कि हम किन लोगों के संपर्क में आ रहे हैं। अच्छी संगति हमेशा आगे बढ़ाने वाली होती है। कहा भी जाता है कि - ‘जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन।’ अर्थात आप जैसी संगति में बैठेंगे, वैसा ही फल प्राप्त होगा। अतः हमें सोच-समझकर अच्छे लोगों की ही संगति करनी चाहिए।
प्रश्न -2- संकेत बिंदुओं के आधार पर अनुच्छेद लिखिए-
(क) मेरी स्कूल बस
बस से जाना
मिलजुलकर रहना
समय का ध्यान
मित्रों का साथ
(ख) मोबाइल फोन
सुविधाएं
मित्रों से बातचीत
माता-पिता के सामने बात
सही रूप से प्रयोग आवश्यक
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