बुजुर्गों का करें सम्मान
“पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है।
आजकल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है।
हर चीज़ मुहैया है मेरे शहर में किस्तों पर,
आजकल हसरतों पर लगाम कौन रखता है।
बहलाकर छोड़ आते हैं वृद्धाश्रम में मां-बाप को,
एक आश्रम का इंचार्ज आता है। साथ में बूढ़ी महिला है।
वह कहता है-आइए माताजी आइए।
एक वृद्ध चश्मा लगा कर अखबार पढ़ रहा है। खड़े होते हुए-
अरे बहन जी नमस्ते। आइए आइए।
इंचार्ज (आगे बढ़ते हुए)- क्या जमाना आ गया है, एक माता चार बच्चों को पाल सकती है, पर चार बच्चे मिलकर एक माँ को नहीं पाल सकते। इसीलिए तो ये वृद्धाश्रम की चौखट पर खड़े हैं।
स्लोगन -
ए जमाने यह कैसी तेरी रुसवाई है
क्या भूल गया तू वह तेरी परछाई है
क्या भूल गया तेरी यह जिंदगी उसने ही बनाई है
जो ना भूला, तो फिर आज किसकी मां वृद्धाश्रम आई है?
कहकर चला जाता है।
वृद्धा इधर-उधर देख रही है।
वृद्ध - बहन जी, इत्मीनान से बैठिए। अब तो इसे अपना ही घर समझिए।
वृद्धा (बिगड़ते हुए)- न, न, मेरा घर तो वह है, जिसे मैंने और मेरे पति ने खून पसीने की कमाई से स्वर्ग जैसा सुंदर बनाया है। जहां मेरे बहू-बेटे और पोता-पोती रहते हैं।
वृद्ध (हंसते हुए) - अरे, भूल जाइए, स्वर्ग से सुंदर घर को।
वृद्धा (बिगड़ते हुए) -अरे वाह! क्यों भूल जाऊं? भाई साहब, मैं यहां बसने नहीं आई हूं। मैं तो सिर्फ हफ्ते दस दिन के लिए ही रहने आई हूं।
वृद्ध (हंसते हुए) - हूऊऊऊं। तो आप सिर्फ आठ-दस दिन के लिए यहां आई हैं।
वृद्धा - आपको क्या झूठ लग रहा है। अरे, वो तो मेरे बहू-बेटे हफ्ते भर के लिए शिमला घूमने जा रहे हैं। वो मुझे इतना प्यार करते हैं कि उन्हें वहां भी मेरी ही चिंता सताती रहेगी कि मैंने खाना खाया या नहीं, मेरी तबियत ठीक है या नहीं। इसलिए मेरी देखभाल के लिए मुझे यहां छोड़ गए हैं।
शिमला से आते ही मुझे वापस ले जाएंगे।
वृद्ध - अरे बहन जी, आप बुलावे में न रहिए। आप जितनी जल्दी इस जगह को अपना लेंगी, उतना ही आपके लिए अच्छा रहेगा।
वृद्धा (गुस्से में) बकवास मत करो। मेरा बेटा मुझसे बहुत प्यार करता है। मैं तो सोच रही हूं कि मेरे बिना वह इतने दिन कैसे रहेगा।
वृद्ध - अरे बहनजी, जो यहां आता है, वह इतनी आसानी से नहीं जाता। खैर, समझाना मेरा काम है……
वृद्धा - ठीक है ठीक है। यदि आप समझा चुके तो शांत रहिए। ज़रा मैं अपने बेटे को फोन करके उसके हाल-चाल तो ले लूं।
वृद्ध - अरे बहनजी, नहीं उठाएगा फोन।
वृद्धा दो-तीन बार फोन मिलाती है। उदास होकर कुर्सी पर बैठते हुए बोलती है-
लगता है, कहीं व्यस्त होगा। आखिर उसकी जान को भी तो सौ काम हैं।
स्लोगन -
वृद्ध हैं अनुभव की खान,
उनका करें सदैव सम्मान।
वृद्धा फोन मिला रही है, पर कोई फोन उठा नहीं रहा है। दुखी दिखाई दे रही है।
वृद्ध चाय पीते हुए - अरे बहनजी, चाय पी लीजिए। ठंडी हो रही है। नहीं उठाएगा वो फोन। आपको आये हुए तीन महीने बीत चुके। मैंने तो पहले ही कहा था कि जो यहां आता है, वह इतनी आसानी से वापस नहीं जाता।
अब तो आप यहां की आदत डाल ही लीजिए।
वृद्धा चाय पीने बैठ जाती है।
स्लोगन -
जिन्होंने हमें सहारा दिया,
बुढ़ापे में हम उन्हें सहारा दें।
बुजुर्ग होते घर की नींव,
इनका सम्मान करें हर जीव।
यही है हमारी संस्कृति,
न अपनाएं बुरी कृति।।
अरे भाई साहब, आपने आज सुबह से खाना नहीं खाया।
कुर्सी से उठने का उपक्रम करती है, तभी वृद्ध बोलता है।
वृद्ध - अरे बहनजी, रुकिए। आज 31 तारीख है और मैं 31 तारीख को खाना नहीं खाता हूं।
(वृद्धा वापस बैठते हुए, आश्चर्य से) ऐसा क्यों, भाईसाहब।
वृद्ध - अरे, छोड़ो भी, क्या करेंगी जानकर।
वृद्धा - अरे भाई साहब, बताइए भी। पहेलियां न बुझाइए।
वृद्ध - बहनजी, दरअसल बात ये है कि मेरे दो बेटे हैं। दोनों ने मुझे बांट लिया। 15 दिन एक लड़का भोजन खिलाता था, अगले पंद्रह दिन दूसरा बेटा। पर वो ये भूल गए कि कुछ महीने 31 दिन के भी होते हैं। 31 तारीख को मैं भूखा ही रहता। धीरे-धीरे 31 तारीख को खाना न खाने की मेरी आदत ही बन गई।
वृद्धा - ओह! क्या जमाना आ गया है।
वृद्ध - अरे छोड़ो मेरी बात, आज आप को एक खुशखबरी देनी है।
वृद्धा - (खुश होते हुए) सचमुच। क्या आपका बेटा आपको लेने के लिए आ रहा है।
वृद्ध - अरे बहन जी, मजाक छोड़ो। आज एक स्कूल के कुछ बच्चे यहां आ रहे हैं, हमसे मिलने। (हंसते हुए) हमारे अनुभव जानने।
वृद्धा -अरे वाह।
क्या जमाना आ गया है, अपने घर के बूढ़ों को तो वृद्धाश्रम पहुंचा दो और फिर अपने बच्चों को जीवन मूल्य सीखने के लिए वृद्धाश्रम भेजो।
वृद्धा - छोड़िए भी भाईसाहब, मैं तो सोच रही हूं कि उन बच्चों से मिलकर कितना मज़ा आएगा।
वृद्ध - (खुश होते हुए) हाँ, यह तो सच है। वृद्धाश्रम में सभी को इस दिन का ही इंतजार
रहता है।
वृद्ध - लगता है बच्चे आ गए। मैं देखकर आता हूं।
(कहकर स्टेज से बाहर चला जाता है।)
बच्चा-इन बुजुर्गों की बातें सुनकर तो दिल भर आया। पता नहीं, कैसे बच्चे होते हैं जो अपने माता-पिता को घर से बाहर निकाल देते हैं।
अब तो चलने का समय हो गया। चलता हूं।
(एक ओर देखकर) अरे! वहां भी एक दादी जी बैठी हैं। चलो, उनसे भी मिल आता हूं।
(वृद्ध महिला चश्मा लगाए अखबार पढ़ रही है)
(बच्चा उसके पैर छूते हुए) प्रणाम दादी जी।
वृद्धा - खुश रहो बेटा। (कहकर जैसे ही सामने से अखबार हटाती है, वैसे ही वह बच्चा भी सिर ऊंचा करता है)
बच्चा- (चौंकते हुए) अरे! दादीजी, आप, यहां।
दादी (आश्चर्य से) अरे! बेटा रोहन तुम।
बच्चा - दादीजी, आप यहां वृद्धाश्रम में। मम्मी-डैडी ने तो बताया था कि आप तीर्थयात्रा पर गई हैं।
वृद्धा - अब तो यही मेरा घर है, यही मेरा पालना और यही मेरा तीर्थ।
बच्चा - दादी, अब मैं आपको लिए बिना उस घर में वापस नहीं जाऊँगा।
(दोनों गले लगकर रोने लगते हैं। रोते-रोते वहीं नीचे बैठ जाते हैं।)
स्लोगन - बुजुर्गों का जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हमारा और आपका अतः सब की भावनाओं का सम्मान करें।।
बुजुर्गों की सेवा का फल इसी जन्म में मिल जाता है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें